एक स्वयंसेवक का बलिदान..! “चॉकलेट” काका ने दिया उस युवक को जीवनदान…!

    27-Apr-2021
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कोरोना की महामारी आज हर किसी की जान लेने पर तुली हुई है | चारों ओर से बस नकारात्मक खबरें ही आ रहीं हैं ऐसे में एक खबर ने जहाँ हमारी आँखों में आँसू लाए, वहीं सभी को एक प्रेरणा भी दी | ये कहानी है नागपुर के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरीष्ठ स्वयंसेवक नारायण भाऊराव दाभाडकर की कहानी | जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दे कर एक युवक की जान बचा ली | हाल ही में शिवानी वाखरे जी ने अपने फेसबुक पर ये कहानी सभी के साथ साझा की, और एक अनोखे बलिदान की कथा हमारे सामने आई. 


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नागपुर में जब भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संचलन होते थे, कभी रैलियाँ होती थीं, या कुछ सभाएँ होती थी, तो ये काका सभी के लिये अपने साथ ढेर सारे चॉकलेट्स ले कर जाते थे | बच्चे हों या बडें सभी को इनके चॉकलेट्स से और उससे भी ज्यादा इनसे बहुत ज्यादा लगाव था | कई बार तो इनके चॉकलेट्स की याद स्टेज पर सेभी निकाली जाती थी | नारायण काका को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कारण सभी जानते थे |
 
 

कोरोना महामारी अधिकतर लोग त्रस्त हैं, ऐसे में नागपुर के स्वयंसेवकों के बीच “चॉकलेट काका” के नाम से प्रसिद्ध ८५ वर्ष के नारायण दाभाडकर भी इससे अछूते न रहे | उन्हें भी कोरोना ने अपने चुंगल में जकड लिया | और सिलसिला शुरु हुआ हॉस्पिटल में बेड्स ढूँढने का | उनकी बेटी भी कोरोना से पीडित थी, अत: उनके छोटे दामाद ने उन्हें एक असपताल में बडी मुश्किल से भर्ती कराया | वहाँ बहुत जद्दोजेहद के बाद एक बेड काका के लिये मिला था | काका को साँस लेने में तकलीफ हो रही थी, लेकिन वे चल पा रहे थे | हॉस्पिटल में काका खुद चल कर गए |



उन्हें एडमिट किया गया | तब उन्होंने देखा एक महिला अपने पति के लिये बेड ढूँढ रही है | उनके पति को कोरोना हो गया था, और उन्हें ऑक्सिजन बेड की आवश्यकता थी | उसकी हालत बहुत खराब थी, और वो महिला परेशान होकर रोए जा रही थी | कि कहीं से एक बेड मिल जाए | काका ने उसकी हालत देखी, और डॉक्टर से कहा, “मेरा जीवन मैंने बहुत अच्छे से जिया है | मेरी उम्र ८५ वर्ष है और मैं जीवन का भरपूर आनंद ले चुका हूँ, लेकिन अभी मुझसे ज्यादा बेड की आवश्यकता इस व्यक्ति को है | उसकी उम्र सिर्फ ४०-४५ की है | बाल बच्चे वाला आदमी है, उसे तो अभी पूरी जिंदगी जीना है | मुझे इस बेड की आवश्यकता नहीं है, आप मेरा बेड उसे दे दीजिए |” घरवालों ने समझाया, बेटी ने समझाया, लेकिन वे नहीं माने, आखिरकार परिवार ने कंसेंट लिखकर अस्पताल को दिया | और काका ने अपना बेड उस व्यक्ति को दे दिया | बिना किसी बात का दिखावा किया, बिना ढिंढोरा पीटे काका ने उस व्यक्ति को जीवनदान दे दिया, वो महिला काका को न जाने कितनी दुआएँ दे रही थी | 


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काका घर वापस आए, और दो दिन के बाद ही उनका देहांत हो गया | काका स्वयंसेवक थे, बचपन से उनमें संघ के संस्कार थे, जो उन्होंने मरते दम तक निभाए | आखिरकार समाजहित का काम करते हुए काका अनंत में विलीन हो गए, और हम सभी को एक प्रेरणा दे गए, कि ये वक्त लडने का नहीं है, ये वक्त किसी को दोष देने का नहीं है, बल्कि हम अच्छा क्या कर सकते हैं, ये सोचने का है | काका ने अपनी कृति से दिखा दिया कि ये वक्त सच्चे मायने में एक दूसरे कि मदत करना है | जिसके लिये काका ने अपने प्राणों का बलिदान दिया | 

चॉकलेट काका याने कि नारायण काका को हम सभी की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजली..!