रामप्रसाद की तेरहवी

    20-May-2021   
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भारत एक ऐसा देश है जहां के बच्चे कितने भी बड़े हो जायें माँ-बाप के लिए हमेशा छोटे ही रहते हैं, वो उनकी ज़िम्मेदारी जीवन भर उठाने के लिए तत्पर होते हैं , बेटा भले ही सरकारी दफ्तर का बड़ा साहब हो जाए पर वो अपने माता-पिता से पैसे मांगने का अधिकारी होता है, और बूढ़े माँ-बाप भी खुद तकलीफ़ों में जीकर अपने बच्चों की हर फरमाइश को हसते-हसते पूरा करते हैं। 



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एक साधारण आदमी अपने जीवन में क्या चाहता है? एक अच्छी नौकरी , एक सफल शादीशुदा ज़िंदगी और काबिल औलाद……

मध्यमवर्गीय परिवारों में अक्सर यही चित्र देखने मिलता है, पिता जो की घर का मुखिया होता है वो जी-जान से अपने घर के लोगों का जतन करता है साथ ही आस-पास के लोग , पड़ोसी और रिश्तेदार इन सबका भी ध्यान उसे रखना होता है, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा से लेकर नौकरी लगाने तक यहाँ तक की उनकी शादी और उनके बच्चे होने तक भी पिता की जिम्मेदारी खतम नहीं होती। जहां तक संस्कारों की बात है हर माँ-बाप अपने बच्चों को अच्छे संस्कार ही देना चाहते हैं परंतु कभी-कभी बच्चे ही माता-पिता की उम्मीदों से अलग निकल जाते हैं।

आज हम देखेंगे ऐसे ही कुछ बच्चों और उनके माता-पिता की कहानी “ राम प्रसाद की तेरहवी”

जो शुरु होती है राम प्रसाद के मरने के साथ......


रामप्रसाद और उनकी पत्नी एक छोटे से गाँव मे एकाकी जीवन बिता रहे होते हैं, एक पुश्तैनी मकान और एक छोटी सी दुकान और संगीत इन तीन चीज़ों के अलावा कुछ नहीं था उनके पास 4 बेटे और 2 बेटियों वाले रामप्रसाद और उनकी पत्नी मुश्किल से अपने बच्चों की शक्ल देख पाते थे, साल दो साल में एक बार कोई उन्हे देखने आ जाया करता था।

अन्य माता-पिता की ही तरह उन्होने भी अपने बच्चों को बड़े प्यार से और अपनी हैसियत के अनुसार शिक्षा दी और सभी अपने जीवन यापन के लिए उनसे दूर चले गए, बेटियों की शादी हो गयी, और बेटे दूर शहरों में अपने जीवन में व्यस्त हो गए, पर देखिये ना जिन माँ-बाप ने हाथ पकड़कर चलना सिखाया आज वही अपने बच्चों और पोते-पोतियों को देखने के लिए तरस रहे थे।

ऐसे में अचानक एक दिन राम प्रसाद का निधन हो जाता है और अब एक-एक करके सारे बच्चे अपने पिता के अंतिम दर्शन के लिए घर आने लगते हैं। पहले तो सभी पिता के अचानक चले जाने से दुखी और उदास नजर आते हैं पर धीरे-धीरे सबकी सच्चाई बाहर आती है, वो बूढ़ी माँ जिसने अपने जीवनसाथी को खोया है उसकी चिंता ना करते हुये सभी अपने-अपने स्वार्थ को पूरा करने में लगे हैं, जैसा की अक्सर घरों में होता है घर का छोटा बेटा माँ का लाड़ला होता है, यहाँ भी उसी तरह छोटा बेटा माँ के सबसे करीब होता है और वही माँ के बचे हुये जीवन के बारे में सोचता है, पर जैसे सब अपने निजी कारणों से परेशान हैं वैसे ही उसकी भी अपनी समस्या है |



अब ऐसा है ना की बच्चों को पुरानी बातें निकालकर बहस करने से फुर्सत मिले तब ना......कैसे पिताजी ने बड़े बेटे की शादी मे खर्चा कम किया , बड़ी बहन को हर बार माँ के कारण कितना त्याग करना पड़ा, सभी ने अपने-अपने समय कैसे समझदारी दिखाई की जैसे बच्चे ना होते तो बिचारे माँ-बाप जीवन में कुछ ना कर पाते।

इन सारी बातों के साथ कहानी आगे बढ़ती है, अब बात आती है तेरहवी की , 1जनवरी को तेरई की जाये या नहीं ये भी बहस का मुद्दा होता है, जहां पूरी दुनिया नए साल का जश्न मनाएगी वहाँ ये बिचारे पिता के चले जाने से दुख मे होंगे। एक तरफ नाती-पोते अपने आप में ही व्यस्त है कोई पड़ोस की लड़की से दोस्ती करने में लगा है तो कोई अपने मोबाइल और लैपटाप में दिन रात व्यस्त है, उनके मन में कोई भावना नहीं की जो गए वो उनके पिता के पिता थे, वहाँ उनके पिताजी ये सोच रहें है की किसी और दिन नहीं कर सकते क्या तेरई?? पिताजी को भी ऐसे ही दिनों में क्यूँ जाना था??

ये मसला तमाम झगड़े और बहस के बाद जैसे-तैसे सुलझता है उतने में एक और नया मसला खड़ा है, आगे माँ का क्या होगा?? वो अपना बाकी जीवन किसके साथ रहेंगी??

ये भी एक बड़ी चिंता का विषय बन जाता है, 4 बेटों और 2 बेटियों के होते हुये भी अब उस बूढ़ी माँ को सोचना पड़ेगा की वो कहाँ जाए?? धीरे-धीरे ये कहानी एक नया मोड लेती है, प्रॉपर्टी, पैसा , पुश्तैनी मकान, गहने, जैसे सारे मुद्दे निकलते हैं, किसको क्या जवाबदारी लेना चाहिए थी और कौन निकम्मा निकला इस पर चर्चा और बहस छिड़ी होती है, बात घर बेचने तक आ जाती है। पर अंत में उनकी बूढ़ी माँ ऐसा फैसला लेती है जिसको देखकर आपकी आंखो में आसू निश्चित ही आएंगे।

ये कहानी सिर्फ फिल्म नहीं आजके अनेक घरों की हकीकत है, आज अनेक घरों के बच्चे अपने माता-पिता से दूर रहते हैं। हाँ ऐसा बिलकुल नहीं है की बाहर रहने वाला हर इंसान अपने माँ-बाप को भूल जाता है पर बहुत सी जगह आपको ऐसे कडवे अनुभव आते हैं, ये कहानी ऐसे ही लोगो पर आधारित है।

इस फिल्म में सब एक से एक कलाकार उत्तम अदाकारी से आपका मन जीत लेते हैं, सुप्रिया पाठक , मनोज पाहवा , नसरूद्दीन शाह, कोंकणा सेन, विनय पाठक, निनाद कामत और विक्रांत मेस्सी जैसे दर्जन भर एक्टर , सीमा पाहवा की कहानी और निर्देशन सभी दिल को छू लेने वाले हैं, एक सामान्य परिवार की कहानी कहती ये फिल्म आपको बहुत बड़ी और असामान्य सीख दे जाती है। छोटे-छोटे झगड़े, मनमुटाव हर किसी के घर मे होता है पर उन सब बातों से बढ़कर एक दूसरे का साथ होता है , ऐसे ही खट्टे-मीठे-कडवे रिश्तों का ताना-बाना बुनती ये फिल्म आपका मनोरंजन जरूर करती है, कहानी में और क्या-क्या होता है ये जानने के लिए एक बार समय निकाल कर ये फिल्म जरूर देखें।

माता-पिता अपने बच्चों को सिर्फ जीवन ही नहीं देते बल्कि जीवन भर उनके साथ खड़े भी रहते हैं , हर मुश्किल हर संकट की घड़ी में माँ-बाप ही होते हैं जो अपने बारे में ना सोच कर केवल अपने बच्चों के बारे में सोचते है। इसलिए ईश्वर से यही प्रार्थना है की कोई बूढ़े माँ-बाप अपने बच्चों के लिए ना तरसे.......



  • प्रगती गरे दाभोळकर